नहि नही धीर रहा,सब जोश बहा,अब नैंया पडि मँजधार रे!

(तर्ज : मन डोले, मेरा तन डोले...)
नहिं धीर रहा,सब जोश बहा,अब नैंया पडि मँजधार रे!
मेरी कौन सुने भगवानबिना? ।।टेक ।।
तू हे दीन - पतित का रक्षक, सन्तोंने यह गाया ।
चाहे औरनसे हो भूला, तुझे न जात छिपाया।
मै शरण पडा, तेरे द्वार अडा, यह पूरा धर निर्धार रे ।
मेरी कोन सुने भगवानबिना ? ।। १ ।।
जिसपर रखा भरोसा मैने, धोखा दे फँसवाया ।
यह संसार बला हे बूरी, अनुभव कर भरमाया ।
यह कहे कहाँ ? हे कौन यहाँ, सुन लेनेको तैयार रे?
मेरी कौन सुने भगवानबिना ।।२।। 
जब संकट में डुबे आदमी, रहे न किसिका प्यारा ।
कोई न देगा उसे सहारा, घूमे मारा मारा ।
फिर जाऊ जहाँ, नहीं खोज वहाँ, तुकड्याने पाया सार रे ?
मेरी कौन सुने भगवानबिना ? ।।३।।