बन्दे सुन कलजुग की बात! न सुनी आज सुनाता ।।टेक ।।

(तर्ज: तूने रामभजन क्यों छोडा... )

बन्दे सुन कलजुग की बात! न सुनी आज सुनाता ।।टेक ।।
एक दिन कलजुग बना बेपारी, करे साधूसंग बाता |
थोडा तो झूठ बोलो तुम, फिर हमरा जम जाता ।।1॥
साधूने दे दिया बचन-मैं कभू नहिं झूठ बताता।
चाहे जो करले कली-राजा, यह हमसे नहीं होता ।।2 ॥
क्रोधमें आकर कहे कलजुग-एक बुरी बात चलाता।
इस साधु के प्रवचन में एक, गंदी  बात    बहाता  ।।3।।
एक दिन मछली बेचनेवाला, प्रवचन में ही आता।
कहे साधुजी कलका पैसा,अभितक क्यों नहिं देता।4।।
दुसरे दिन एक शराबवाला, प्रवचन में बतलाता।
शराब के कई रोजके पेसे,अभितक क्यों नहि देता।।5॥
तिसरे दिन आयी एक वेश्या, कह गयी करलो बाता।
हम जैसोंके कई रोज के, पैसे क्यों   नहिं   देता    ।।6।।
दिन-पर-दिन सब समाज भागा, जरा न भक्ती भाँता।
कहे कहाँका प्रवचन भाई, यह सब ढोंगी  सुहाता ।।7।।
प्रवचन के कर्ता-धर्ता भी, कह गये यह क्या होता? |
साधों अब तो जाना ठीक है,जरा लोग नहीं आता।।8। 
साधूके दिलमें भी आया, होजाये जो होता।।
पर मैं सत्य नहीं छोड़ूंगा, प्राणभि क्यों नहिं जाता ॥9।।
एक दिन आत्मसमर्पण करने, साधू मन ठहराता ।
पता चला जब आया कल-जुग, हात जोड सुनवाता ।।10।।
ऐसा न करो संत ! हमारा बुरा नतीजा होता ।
देखा हमने आप सही हो, अभी पलट दूं बाता ।।11॥
हुई बिमारी गाँव भरेमें, जो सो  रोता जाता।
कहा किसीने उसी संतको, लाये बीन नहिं होता।।12।।
फिर जब संत गये बस्तीमें, अपनी बानि सुनाता।
भला हुआ जनताका पलमें, खुश होगयी सब जनता ।।13।।
फिर सबको होगया पता, वह थी सब झूठी बाता |
कलजुगने था जाल रचा जो, नाहक साधू फसाता ।।14 ।।
जब साधूका सत्य जगत्‌ के, नयनों में भर आता।|
तुकड्यादास कहे कलजुग भी, चरणोंमें पड़ जाता ।।15।।