बरसो करता हूँ भजन, पर मन नहीं करता मनन ।

(तर्ज: क्यों नहीं देते हो दर्शन...

बरसो करता हूँ भजन, पर मन नहीं करता मनन ।
है कहाँपर भूल यह, बतलादो प्यारे संत - जन ।।टेक।।
रोज गीता हाथमें लेकर, उसे   पढता   हूं  मैं  !
एक घडि चिंतन न होता, भूलता फिरता है मन ।।1।।
मंदिरों में दर्शन लेने, रोज ही जाता हूँ मैं ।
पर न बैठा है अभी तक, दिल में मेरे वह पूजन ।। 2।।
जिंदगी में संकटों का, पेंच जब होता खडा।
माँगता हूँ साथ उनकी, याद  करता हूँ   भजन ।। 3।।
सुख में रहता हूँ कभी, तब भोग ही है सूझते।
फिर कहा बैराग है, याद नहिं   होता   है   क्षण ।।4 ॥
ऐ प्रभो ! किरपा करो, बनके रहूँ तेरा सदा।
आस हो तुकड्या की पुरी,हो सफल मेरा जीवन ।।5।।