मोरे मन! गुरुदर्शन से जागो, सब विषयन से भागों ! ॥टेक ॥
(तर्ज: अखियाँ गुरु दरसन की प्यासी...)
मोरे मन! गुरुदर्शन से जागो, सब विषयन से भागों ! ॥टेक ॥
यह संसार ज्वाल जादूसम, जरा न इसमें लागो ।
कोउ न सुख पाया अभिमानी, रावण सम सब नागो ॥1।।
बिन सत्-संग न उपजे भक्ति, बिन भक्ति न मन रंगो ।
तुकड्यादास दास के दासा, बनकर रहत निसंगो ॥2।।