बरसों लगी हुई है, प्रभु-प्रीत यह हमारी।

(तर्ज : अरे कोण कोण येतो त्या स्वर्ग सुखाला...)

बरसों लगी हुई है, प्रभु-प्रीत यह हमारी।
जीते इसीके कारण, बस नीत यह हमारी।।टेक ।।
उद्योग है तो येही, खेती कहो तो येही।
प्रभु-नाम को रिझाना, अरु रीत है हमारी।। 1 ।।
बनता है जितना कहते, चारित्र्य -भक्ति-सेवा।
कोई तो मानते है, कोइ ना    सुने  हमारी।। 2 ॥
सब देशमें ही चक्कर, पक्षीकी तरह चलता।
साथी भी कहीं रहते, यहि जीत है हमारी।। 3 ॥
अबतक यही चली है, सेवा ये मानवों की ।
तुकड्या कहे प्रभु है, परतीत यह हमारी!।। 4 ॥