बता रे, परदेशी ? तुझको लुफ्त कहाँसे आया?
(तर्ज : आजा रे परदेशी.....)
बता रे, परदेशी ?
तुझको लुफ्त कहाँसे आया?
कहे वो मैखाने में पाया! ।। कहे वो0।।टेक ॥
नाचनवाली कहे नाचन में।
वाचनवाले कहे वाचन में।।
कहे, दिदारी दीदार में भाया! ।। परदेशी 0।।1।।
भांडने बोला, भटकाने में ।
चोरने बोला, धन लाने में ।।
आलसी बोले, कर्ज सुखाया ! ।।परदेशी 0।।2।।
बोला एक गद्दार झूम के।
घुसखोरी बिन सुख ना हमको ।।
कहे शिकारी मारके पाया ! ।। परदेशी0 ।।3।।
गुण्ड कहे, झगडे में सुख है।
वेश्या कहे,विषयों में सुख है।।
नेताने सुख बकमें पाया ! ।। परदेशी 0 ।।4।।
तुकड्यादास कहे,प्रभु के बिन ।
सुख नहिं पावे कोई भी क्षण। ।
चिदानन्द रुप मोर मन भाया !।।परदेशी0।।5।।
-अयोध्या; दि. १३-0८
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