बजारे तेरी बाँसरी !

(तर्ज : आजा रे परदेशी.... )

बजारे तेरी बाँसरी !
मैं तो कभि कि हूँ कान लगाय! !
मेरी ये अरमा को कर दे पुरी ।।टेक ।।
कई सखी बन में पागल बनके-।
घूम रही   नाचे  मन-मन   के ।। 
किसने है ये जादु भरीं।। तेरी बाँसरी 0।।1।।
ये देखो ग्वालन के बाला।
मस्त भये  गाते  गोपाला।।
तन-मन-जनकी सूध हरी ।। तेरी बाँसरी 0।।2।।
गैय्या भी चरती, झुमती हैं।
कान लगाकर घुम-घुमती है।।
तुकड्या कहे, सुध ले हमरी ।। तेरी बॉँसरी 0।।3।।