मनका मत सुनना गाना, जहाँ दिलदार तुझे पाना
(तर्ज : जपका अजब तडाका बे...)
मनका मत सुनना गाना, जहाँ दिलदार तुझे पाना ।। टेक ।।
अर्गन बाजा क्यों छोडा है, गधडे सुरको सुनता ।
दस नादोंको जान पियारे, संत उमे धुन रहता ।। १ ।।
राजा होकर चक्की पीसे, खूब तेरी चतुराई।
अमृत होकर गटको (गटार) खाता, किसने चेन सिखाई ।। २ ।।
ज्ञानी होकर भूला जगमें, क्या पाता है साँई ?।
टूश्य जगतको मत मानो बे, झूठ पसारा भाई ।। ३ ।।
अच्छा कहके बूरा कहता, ऐसी मनकी बोली ।
दगाबाज को मत मानों बे, आवे करमें झोली ।। ४ ।।
कहता तुकड्या दास गुरुका, अपने धुनमें धुन लो ।
सब संतन को शीश नमाकर, निजमें जाकर गुनलो ।। ५ ।।