मेरी आर्जिपे मर्जी हो नाथ तेरी
(तर्ज : एक रात दो दो चांद खिले...)
मेरि अर्जिपे मर्जी हो नाथ तेरी, ऐसीहि सिफारिश चाहता हूँ ।
बिन नाथके कौन अनाथको है, यह जान चरणसे रहता हूँ ।।टेक।।
जिसपे है भरोसा आज मेरा, शायद वह धोखा दे कलको ।
यह जान गया दिल-मनसे मे, इस कारण नाथसे कहता हूँ ।।१।।
गुरुदेवने मंत्र दिया है मुझे, जपता हूँ सदा जो समय मिले ।
पर स्थीर न चित्त रहे फिर भी, विषयोंके बहावसे बहता हूँ ।।२।।
मै एक घडी एक घड़ी तो तेरा हूँ, फिर कह नहिं सकता कौन घिरे ।
तुकड्या कहे मेहर नजर कर दे,यह दुःख जनम से सहता हूँ ।।३॥