मनके मन शरमाऊँ
(तर्ज: सासरला मुलगी निधघाली. ... )
मनके मन शरमाऊँ, देख न पाँऊ ,
अवगुण मेरे कैसे छिपाऊँ ।।टेक।।
बात बडी पर करनी है खोटी,शान बडी पर रीत है उलटी ।
ध्यान धरूँ फिर भी नहीं पलटी,किसको यह बतलाऊँ,लाज सुनाऊँ,
अवणुण मेरे केसे छिपाऊँ 0।।१।।
इंद्रिय जोर करे विषयोंमे, संयम नहिं खाने-पीने में ।
शांति नहीं थोडी जीनेंमे, किसके शरणमें जाऊँ,फिर सुख पाऊँ,
अवगुण मेरे कैसे छिपाऊँ 0।।२॥
पापी कहनेको डरता हूँ, पाप करनेको मरमरता हूँ ।
यह सब समझ उमझ करता हूँ,इससे बल नहिं पाऊँ,लाख रिझाऊँ,
अवगुण मेरे कैसे छिपाऊँ 0।।३॥
तुम जानो हो प्रभु घट-घटकी, बात रखो मुझसे अटसटकी ।
तुकड्यादास न बोली लटकी,तुम्हिपर बोझ बहाऊँ,अब नहीं साहूँ,
अवणगुण मेरे कैसे छिपाऊँ 0।।४।।