बखत आगयी कुछ तो करले सही है
(तर्ज: जमी चल रही आसमा चल रहाँ है...)
बखत आगयी कुछ तो करलो सही है ।
अरे यार ! तेरी सुरत भी नहीं है ।।टेक।।
तुझे दे दिया था वो संस्कार किसने ?
किसीके भरोसे लगेगा तू इसमें?
बलुल बो दिया, आम निकले कहाँसे ।।१।।
लगी होती तस्वीर घरमें शूरोकी ।
नजर भी पड़ी होति चरणोंमे उनकी ।।
तभी तो खबर जानमें आरही है ! ।।२।।
रहा है समय अबतों उठ जाग बन्दे ।
जरा होश में आके, तज काम गन्दे ।।
नहीं तो समझ अबके नैया बही है ! ।।३।।
यही भक्ति है और यही मुक्ती होगी ।
बची संस्कृती तो बडी जुक्ति होगी।।
कहे दास तुकड्या,संभल जो रही है! ।।४।।