मान मान रे कहा, मेरा मान रे
(तर्ज : चली चली रे पतंग मेरी चली रे...)
मान मान रे कहा,मेरा मान रे ।
मान ग्यानकि पुकार, करले अपना बेडापार,
नहिं तो हो गया नादार,सही जान रे ! ।।टेक।।
जिसने न कहा कुछ माना ।
वह घुमता फिरे दिवाना ।।
चले बेडरकि चाल, फिर हुये सारे हाल,
चारों ओरसे कंगाल, सही जान रे ! ।।१।।
संसार मीठा लगता है ।
अंतमें जिया भगता है ।।
कोई देता नहिं साथ, सारी स्वारथ की बात ।
होते दूर जात - पाँत, सही जान रे ! ।।२।।
इसिलिये कहा मेरा मान तू ।
जीवन में सुधर तेरि जान तू ।।
कहता है तुकड्यादास,रखले ईश्वर की आस,
बन जा दासनका दास,सही जान रे ! ।।३।।