नहीं नही रे फिकर तुम्हे नहीं रे

(तर्ज : चली चली रे पतंग मेरि चली...)

नहीं नहीं रे फिकर तुम्हें नहीं रे,
नहिं धरमकी आस, देश होगया उदास -
कोई   रहा  नहि   पास, सच   कही  रे ! ।।टेक।।
कितनोंने धरम को छोडा, साधू-संत-बचन को मोडा ।
किया दूसरोंसे प्यार, कई गये परद्वार ,
नहीं   तुम्हारा  अधार, सच  कही  रे ! 0 ।।१।।
तुम खाते धरमकी रोटी,पर बात बनाते झूठी ।
गांजा-चरसमें स्नान,ध्यान खो दिया तमाम ,
अबतो होने लगी शाम, सच कही रे ! 0 ।।२।।
गुरुओं की गमायी बानी, नहीं रहा तुम्हारा पानी ।
अबतो आवेगा तृफ़ान,दुनिया होगयी हैरान ,
कौन लावे उसमें जान, सच कही  रे ! 0 ।।३।।
कुछ देखो आँख उठाओ,अबतो भी धरम सिखलाओ ।
कहे तुकड्या ये दास,मत धरम करो नाश ,
साधू साधू आओ पास,सच  कही  रे ! 0 ॥४।।