बादल गरजे यार !
(तर्ज: बाबरी मैं बन गयी...)
बादल गरजे यार ! मीठी मीठी है झनकार ! !
ना ये मन! मोह जाss कहीं ! ।।टेक।।
कहाँ तो तारन की चमक उमंगाती है ।
कहाँ तो बिजली की रोशनी सुहाती है ।।
सूरज का परकार, आँखों भरता प्यार ।
ना ये मन ! मोह जाss कही ! ।।१।।
कहाँ तो अनहद॒ की बाँसरी अनोखी है ।
कहाँ तो सुन्दर करताल लगे बाकी है ।।
घुंगरु की बहार, डमरु की ललकार ।
ना ये मन! मोह जाss कहीं ! ।।२।।
कहाँ तो सोहं की मधुर झुनझुनाती है ।
कहाँ तो प्राणों की,लो लगन लगाती है।।
तुकड्या जाने सार,इसके आगे है करतार।
ना ये मन ! मोह जाss कहीं ! ।।३।।