प्रभू तेरा अन्त किसे नहि पाया !

(तर्ज : भेय्या मोरे, राखीके बंधन की... )
प्रभु तेरा अन्त किसे नहि पाया !
कैसी तुझको छुपाति है तेरी माया ! !
लाखों जनम भरमाया, भरमाया ! ॥प्रभु तेरा 0।।टेक॥
बन-बन आसन योगी लगावे ।
जप-तप साधन जोगी सधावे ।
पंच    अगन   बैरागी   तपावे ।
जल -शैय्या अपनी  बनवावे ।।
पर भी न दर्श दिखाया, दिखाया ! प्रभु तेरा 0।।1।।
शात्र वेद मंथन कर डारे ।
चारो  धाम - तीरथ   कर   डारे ।
तुकड्या कहे, मनको नहिं मारे ।
फिर-फिर सब पछताया, पछताया ! ।। प्रभु तेरा 0।।2।।