फकीरी महाशूरनरकी शूर

(तर्ज : साई तेरो है...)
फकीरी महाशूरनकी शूर । कभी न पावें खल -कामी जन ।
                         इनसे  कोसों  दूर ।।टेक।।
लाभ द्रोह छिपे नहि दिलमें, नही क्रोध अंकूर ।
माया माह  बगलमें   मार । रहे   आत्मम  चूर ॥1।।
अपना आप समाया जगमें । देखें नूर हुजूर ।
मरना घरना एक  समाना । भरा  रंग  भरपूर ।।2॥
करना धरना सब खो बैठा । कुदरतमे भामूर ।
तुकड्यादास कहे मैं गाऊँ । होकर चंकनाचूर।।3।।