मानवकी मानवता जागे

         (तर्ज : सुनो सुनो ऐ दुनियावालों . .. )
मानवकी मानवता जागे युगकी पुकार बोले ।
क्योंकर अपनी अपनी कहता ? फिरता भूले भूले ।।टेक।।
दे दे अपना भू-दान बँटकर, नहीं तो हकसे ले ले ।
तू है लेने - देनेवाला, ऊँची राह  सम्हाले ।।
सभी सुखी तब तू भि सुखी यह मंत्र जरा मत भूले ,
अपना -परका भेद भूलकर, ऊँची चाल चलाले ।।
दिलदिमाग छोटा मत रख तू,सागर बनकर डोले ।
          क्योंकर अपनी अपनी कहता 0।।१।।
क्या पानीने झगडा कीया बरतन में   नहीं   जाऊँ?
क्या आकाश छिपा रहता हे घटमठ में नहीं जाऊँ?
क्या अग्नी पीछे हटती है, मिलकर घास जलाऊँ ?
तब भूमिधर को नहीं देता, क्योंकर भूमि बताऊँ ।।
ये सब  कर्मवान   के    साथी, जो   कतसि   लेले ।
          क्योंकर अपनी अपनी कहता 0।।२।।
मानवका सन्मान यही  है, सबको   मित्र   बनावे ।
सबके सुख -दु:ख में रत होकर,विश्वकुटुंबी होवे ।।
ना मैं अपना, नहीं जाति का, सबका हूँ यह गावे ।
जो पीछे हैं ऊँच    उठावे, ऊँचे   पथसे    जावे ।।
घरघर में आनंद ॒बढावे, अमर   सूख   अजमावे ।
देवरुप मानवता अपनी क्षणक्षण   में   प्रगटावे ।।
तुकड्यादास कहे यही कर तू, जो दर्या बनवाले।
          क्योंकर अपनी अपनी कहता 0।।३।।