मेरी जान बडी घबरावे

(तर्ज: कुणी म्हणती स्वराज्य...)
मेरी जान बड़ी घबरावे ।
जब दान में पैसा   जावे ।।टेक ॥
यह द्वार में याचक खडा।
मेरा उड़ा कलेजा उडा ।
यो कैसा   धन  गमवावे ?।।१।।
बैमानी से   धंदा  किया ।
जब धन गठड़ी में लिया ।
यौ भीक मँगे क्यों खावे ?।।२।।
गर चोर   लटे   तो   भले ।
चाहे    वह     पीछे   चले ।
पर हाथ दिया नहीं भावे ।।३।।
मेरा प्राण अन्त जब चले ।
तब चाहे करो कोई भले ।
तुकड्या कहे पाप अडावे।।४।।