ध्यान धरो अभिमान रहित जब
(तर्ज: वैष्णव जन तो तेने काहिये.. .)
ध्यान धरो अभिमान रहित जब, ग्यान बढ़े गुरुदेव -कृपासे ।
भक्ति करो निष्काम निरन्तर, मुक्ति मिले तर जावे जहाँसे ।।टेक।।
रंग लगे सत्संग सधे जब, अंग बने निःसंग रहासे ।
नेम हटे दिल प्रेम लगे जब, क्षेम चले गुरुदेव-कृपासे ।।१।।
काम रहे नहीं, क्रोध न है फिर, लोभ न दंभ न मोह कहाँसे ।
तुकड्यादास प्यास मिट जावे,जनम-जनमकी गुरु किरपासे।।२।।