महाप्रबल जनशक्ति ! बढाकर

            (तर्ज- वेद शाख्र तुम पढ़े हो...) 
महाप्रबल जनशक्ति ! बढाकर,जोशका दीप जलायेंगे ।
घर-घरमें दीवाली उस दिन मानव-प्रेम फुलायेंगे।।टेक।।
अपना गाँवही महातीर्थ है, यही दान, यही  पून  करें ।
ख़ाना - पीना - रहना   सुंदर, घरघरमें   आनंद  भरे ।। 
मुझ समान सबके घर होंगे,नहीं होंगे तब काम करें ।
भूमिदान धनदान करे, श्रमदान कला-गुण दान करें ।।
हर मानव   है   मूर्ति   प्रभुकी, सेवाद्वार   खुला   देंगे ।
सत्ता-दहशतकी न जरुरी, प्रेमका धर्म चला देंगे ।।१॥
निर्मल सबके हृदय बनाकर, झगडा चुगली दूर करे।
कष्ट करे तब खावे सबही, कष्ट शूर भरपूर करे ।।
जबाँ सही और इमान भूषण, ये गहने सरताज धरे ।
जिधरमें देखो सुन्दरता   है, घरघर में सौंदर्य  भरे ।।
सीधा सरल स्वभाव बीरका ,चपल बिजलीसम तेज धरे ।
सदा मस्त अपने कामोंमे, प्रभू-गान में प्राण भरे ।।
यही करेंगे, अपने जीमें, निश्चयको नहला  देंगे।
तुकड्यादास कहे आलस का,कचरा सभी जला देंगे।। २।।