भूदान करो, धनदान करो

            (तर्ज: दिलमेंही नहीं जब शान्ति...) 
भूदान करो, धनदान करो-यह प्रीय विनोबा बोल रहे ।
जो पाप भरा था छुपछुपके, यह समझ समझकर खोल रहे ।।टेक।।
घरघरमें उसीका गान चला, भूदान का देशमें यज्ञ खुला ।
लाखोंने दान किया अभितक, लेकर मजदूर भी डोल रहे ।।१।।
यहिं है शान्तीसे क्रान्ति चली, क्षणक्षणमें आगे फैल रही।
सुराज्यकी टेक निभावनको, भूदान-प्रचारक तोल  रहे ।।२।।
बापूकी रही सेवा है यही,सब मिलके इसको पूर्ण करो ।
अब देर नहीं है पल-पलकी, पिछडोंके दिल मिल घोल रहे ।।३।।
है जन्मदिनी उस साधूकी,जिससे भूमिदानकी स्फूर्ति चळी ।
तुकड्या कहे जुगजुग जीयेगा ,सब विश्वमें उनका मोल रहे ।।४॥