बेर भई प्रभु क्यो नहिं आये ?

(तर्ज: नैननमों बस जा गिरिधारी... )
बेर भई प्रभु क्‍यों नहिं आये ?
हमरि पुकार नहीं सुन  पाये ! ।।टेक।।
क्‍या चाहते भारतका इनसे ? और नतीजा होवे कैसे ?
मरनेपर भी मारे जैसे ! तडप-तडप जन जात दुखाये।। १॥
कितना धर्म रहा है बाकी ? कितनी लाज रही जानेकी ?
कितनी है गौएँ कटनेकी ? पर- दुःखसे रोती अबलाएँ।। २।।
कितने है पापी बढनेके ? कितने है  सज्जन मरनेके ?
है किसान कितने गडनेके ? वस्त्र नहीं रहते शरमाये।।३।।
है कि नहीं दुनियाँमे आये ? क्या बैकुंठ अभीतक सोये।
या डरते किनके खकराये ?कहे तुकड्या-नहिं खबर सुनाये ।।४।।