धीरे धीरे यह भारत की नैया
(तर्ज : (छंद) हरिका नाम सुमर नर प्यारे...)
धीरे धीरे यह भारत की नैया ऊँचे धाम चली ।
कई अडंगे काट-काटकर,आजादीके काम चली।।टेक।
लिया हाथमें शस्र शांतिका, क्रांतीसे भी वार करे ।
बडे बडे मुस्सद्दी उनके, सर अंदर बेकार करे ।।
न्याय-नीति की रीत उन्होंकी,बिना मारके वार करे ।
सबका बेडा पार करे, एक सेवक भी सरदार करे ।।
उछल उछल जनताकी बीना भूलेको हुशियार करे ।
राग भरे उनके कानोमें, सेवा में तैयार करे ।।
अमर क्रांतिकी लाट उठाकर, पैलपार बेफाम चली ।
कई अडंगे काट-काटकर, आजादीके काम चली।।१।।
स्वराज्य-मंजिल बांध लिया, भारतने अपना राज किया ।
तख्त लिया, दिल्लीका हकमें, बहुत दिनों अंदाज किया ।।
अर्धनग्र एक फकीरने, अपना जीवन कुर्बान किया ।
कई लटकाये फाँसी ! किसको फाँसीसे भी हार दिया।।
कई बीरोंने हालअपेष्टा जनम-मरनतक भोग लिया ।
क्रांति किया कइ शूरबिरोंने राज-तख्त हिलवाय दिया।।
अबतो वे लडनेको पाये, राजदंड ले लिया बली ।
कई अडंगे काट - काटकर, आजादीके काम चली ।।२।।
आगे घर-घर सुख छायेगा, अमीर हो या रंक रहे ।
कीमत उनको वही मिलेगी, हो मोती या शंख रहे ।।
अपना अपना काम करें, और आजादीसे पेट भरे ।
लेना देना फर्ज न होगा, समतासे गुजरान करे ।।
जातपाँत सब हट जायेगी, मिट जायेगी धीरे धीरे ।
जिसका जो कोइ कर्म रहेगा, नाम उसीका वही धरे।।
अमर शहीदोंके स्थलपर अब,कीर्ति ध्वजा उड रही भली ।
कई अडंगे काट - काटकर, आजादीके काम चली ।।३॥
सुनो - देशके वीर - जवानों ! हुई सो बातें ठीक हुई ।
अब आगे मुश्किल है जीवन, थोडेमेंही बात रही ।।
जिधर उधर गुंडोंका आया,उमड-उमडकर मेला है ।
चलो उठो निकलो घर बाहर, तोडो यार झमेला है ।।
रक्षण करो देशका अपने, जो अबतकके पाला है ।
नहिं तो अपनी घमंड के गर्मी में होगा मुंह काला हैं ।।
तुकड्यादास कहे जो दिलमें, आयी सो कह दिया खुली ।
कई अडंगे काट-काटकर, आजादी के काम चली ।।४।।