बंदे है मस्तके हम
(तर्ज : सबके लिए खुला है मंदिर. .)
बंदे है मस्तके हम । चाहते है रंग उन्हीका ।
सुख हो या दुख हो, पर । निर्धारही है जी का ।।टेक।।
चाहता है दिल फकिरी । तन-मनसे है जरूरी ।
लो है लगी नियारी । सोदा लिया खुशीका।।1।।
टुकडा सूखा चबेंगे । बन-बनमें जा घूमेंगे ।
प्रभु-यादमें रमेंगे ! कौपिन पहनके फिका ! ।।2॥
गमकी नशा भरेंगे । दम-दममें स्वार होंगे ।
बस यार के लिए हम । दर्गा करेंगे रूँहका ।।3॥
ना फिकर जिंदगीकी । ना गैर है किसीकी ।
तुकड्या को आस ना है । शैदा हूँ आशकोंका।।4।।