मुझमे न रहे अब मेरा कुछ
(तर्ज : यह प्रेम सदा भरपूर... . )
मुझमे न रहे अब मेरा कुछ , सब सौंप चलू गुरु चरणों में ।
जो कुछ भी कराना सेवक से,सब अर्पण हूँ गुरु चरणों में ।।टेक।।
यह देह नहीं संसार नही, इस मन का कुछ व्यवहार नहीं।
सब तेरा है मैं तेरा हूँ, सब सौप चलु गुरु चरणों में।।1।।
तुम्हरी आग्याका पालन हो, इस लायक बनवालो मुझको।
जो श्रवण करु वही मनन बने ,निज ध्यास रहे गुरु चरणों में ।।2॥
करता रहूँ हरदम कार्य वहीं , जो सद्गुरु को मंजूर रहे।
उनकी आग्या बिन मनन चले,यह तन-मन-धन गुरु चरणों में ।।3।।
ऐ भाग्य विधाता ऐसा हो, तब ही जिवन में सार्थक है ।
तुकड्या कहे अर्जी पेश मेरी , मंजूर करो गुरु चरणों में ।।4।।