मैं चिन्तन प्रभु का ही करुँगा

       (तर्ज: लोटू नको मज दूर कन्हैया...)
मैं चिन्तन प्रभु का ही करूँगा ।।टेक।।
दुनियाँ चाहे   धन  को  मरती ।
या सत्ता  के   पीछू   झरती ।।
मान-प्रतिष्ठा पर घर भरती । 
घुंसखोरी -लुचपत भी करती।।
उधर कभी नहीं   पैर  धरूँगा ।।1।।
कई मानी को उखडते देखा ।
कई घुसखोर पछड़ते देखा ।।
मन पर ही   निगरानी  करुँगा ।।2।।
समाधान-सम कौन धनी  है?
सेवा के सम  कौन   गुणी  है?
नम्र-विनय सम कौन गणी है?
सत्य-समान न कोई मुनि है !
जीया   निछावर, वहीं  करूँगा ।।3।।
धनी जहाँ चरणों में पड़ते ।
सत्ताधारी चौंकी करते ।।
मानी ध्वजा हाथ ले चढते।
घुंसखोर भी  जहाँ  सुधरते ।।
तुकड्या कहे,वहीं अन्त मरूंगा।।4।।