बिगडे हूँए दिल को कहीं

          (तर्ज : आवो सभी मिल जायेंगे. . . ) 
बिगडे हूँए दिल को कहीं, लगता न ठिकाना।
मैं इसलिये आया हूँ तेरे दरपे  दिवाना ।।टेक॥
शांती नही संसार में, लाखों भी कमाया। 
विषयों के भोग में न जरा धीर भी आया।।
खाया हूँ ठोकरें न फिर भी पाया   निशाना ।।1।।
चौधाम तिरथ देख-देख आह बढ गयी ।
पण्डे-पुजारियोंने मेरी अक्ल खागयी।।
दर-दरपे घुमा,फिर न मिला,आखरी बाना।।2।।
अब तेरी मोहब्बत में जो भी हो- यही सोचा।
सेवा करूँ झाड़ू पकडके, सर रखूं नीचा।।
तुकड्या कहे, ये राह  श्रीगुरुदेव  निभाना ।।3।।