प्रभू ! ऐसी दया हो इस दास पर
(तर्ज- तेरी राहो में खडे... )
प्रभू ! ऐसी दया हो इस दास पर ।
मेरा दिलहि लगे ना देह-ध्यास पर ।
मेरे मुखमें हो नाम ।
उसे पाऊँ मैं आराम ।
तजुं विषयों के काम ।
अन्त मिले निजधाम ।। प्रभू ! ।।टेक।।
किस कारण आया दुनियामें ?
इसका अबतक थाह न मनमें।
कौन सन्त बतलायें क्षण में ? ।।1।।
मैं उनकी रज-धूल उठाऊँ ।
भरे बदन पर लेप लगाऊँ ।
ग्यान उन्हींका नहिं भुल पाऊँ ! ।।2।।
जो मुझमें आतम - धुन छाये ।
निजरुप को घट में बतलाये ।
तुकड्यादास पे कर किरपा ये ! ।।3।।