बिगडे किसिको क्या कहे ?
(तर्ज: क्या जाने अमिरी, गरिबी का मजा क्या है ?...)
बिगडे किसिको क्या कहे? हम ही बिगड गये ! ।
अपना न प्रेम दे किसे, दिलमें अकड गये ! ।।टेक॥
दिलमें लगा है जबसे, तारीफ हो पेरी ।
शैतान तबसे घुस गया, अब बारि है मेरी ।।
खुब ठोकरें खाऊँगा, दिलसे दिलहि लड गये ! ।।1।।
चाहिये तो था कि हम, सभी के दास रहेंगे।
अपने सरल स्वभाव सभी के पास रहेंगे ।।
अभिमान, गले आया, सांप सरपे चढ गये ! ॥2।।
दुनियामें हमसे भारी, कै लाख है गुनी ।
पढ़ते है किताबों में, हम उनकि कहानी ।।
पर नम्रता थी उनमें, शीलोंमें पढ़ गये! ॥3।।
हे नाथ ! हमको, बुध्दी मत दे विकार की ।
मस्ती दे भक्ति की, और सत् के विचार की।।
तुकड्या कहे, इस कारण चरणोंमें पड गये! ।।4।।