बन्दे ! क्यो सुख समझे दौडे ?
(तर्ज: सब दिन होत न एक समान... )
बन्दे ! क्यों सुख समझे दौडे ?
तेरे उछटे चल रहे घोड़े ! ।।टेक।।
हँसी-खुशी संसार बनाया, पासके जेवर तोडे।
पुरा न पाया, कर्ज बढाया, फेर छुपे मुँह मोडे ।।1॥
सुदर युवती के संग अपनी मनसे प्रीत जमाई।
अग-भंग हो जाये कहीं,फिर-फिरके दुःख दुहाई ।।2।।
आयी घरको तिरियाँ फिर तो, पुत्र नहीं है भाई।
लाखो यत्न करो फिर-फिरके,जरा सुखी मन नाही।।3।।
पुत्र हुआ पर निकला बेवकूफ, और दुःख मन आवे ।
जो कुछ करता सबही उल्टा,रो-रो आँख सुजावे।।4।।
खैर! जरा लड़का धन लाया, पर मुझको नहिं देता ।
खाना -पीना तंग हुआ फिर, फिरके दु:ख नहिं जाता॥5।।
दिया कहीं खानेको पर तो, चबाँ जरा नहिं जाता।
हैरानी है सारे तनमें, जीवन व्यर्थ सुजाता ।।6।।
तुकड्यादास कहे, ऐ प्यारे ! क्यों संसार में घूले ?
दुःखहि दुःख उठाना इसमें,क्यों नहिं हरि-हरि बोले! ।।7॥