मेरे बढे अभिमान को

        (तर्ज : आवो सभी मिल जायके...)
मेरे बढे अभिमान को, ऊँचा न बढ़ा दे ।
तेरे परम पावन ही, चरणों  में  चढा  दे ।।टेक॥
झूठे ही जगत में किया, झूठा प्रपंच था ।
बेकार था सारा जीवन, छोटा हि  अंच  था ।
आता ही कभी ख्याल तो,सचसे ही लड़ा दे ।।१।।
अंधा हि था अंधियार में, मस्ती में भागता ।
ग्यानी न थी वह इंद्रियाँ,पल पल में जाग था । 
अच्छी   बनाके   आँखे, यह   भेद  उडा   दे ।।२।।
बेरंग में सोया पडा, कई    दूर   दूर   था । 
विषयों के भरे किचड का,    ही सहूर  था ।
तुकड्या को तेरे दर्श से,हरदम ही जुड़ा दे ।।३।।