प्रेम करना सीख लो
(तर्ज : हर जगह की रोशनी में . .. )
प्रेम करना सीख लो, फिर कुछ नहीं बाकी रहा ।
नाथ भी खुश होगया,फिर और क्या साखी रहा?।।टेक।।
द्रौपदी के प्रेम से रखी लाज जो जाती बही ।
प्रेम सीखा गोपियोंने, न गया मोहन वहाँ ।।1।।
बेर शबरी के थे झूठे, कौन नहिं हैं जानता ?
प्रेम के मारे प्रभूने, खा लिये कहे बाहवा ! ।।2।।
था सुदामा भी दरिद्री, प्रेम था प्रभूसे जमा ।
वक्त जब आया, प्रभूने कनक धाम दिया महा ।।3।।
क्या कहूँ तारीफ उसकी ? जो कोई सच प्रेम दे।
कहत तुकड्या आज भी,देखा न कुछ कमती वहाँ ।।4।।