भले आदमी तू किधर जा रहा है। खुद को भुक्ला और ख़ुदा गा रहा है
(तर्ज: जमीं चल रही, आसमाँ चल रहा है...)
भले आदमी तू किधर जा रहा है।
खुद को भुक्ला और ख़ुदा गा रहा है ।।टेक।।
इसीही तह्रे कोई तीरथ को जावे।
खुदको भुले और पानी में न्हावे ।।
किसीके बतायेसे, बहका रहा है।। भले आदमी 0।।१।।
जरा पूंछ तो-ना चेतन तू होता?
क्या किसिके माथे तीरथ को पाता ?
तू है सबका साक्षी,क्यों अजमा रहा है।।भले आदमी 0।।२॥
तेरे सामने ही तो बचपन जवानी ।
बुढापा - अमीरी-गरीबी ये ठानी।।
मगर तू था जैसा, वहि तो रहा है।। भले आदमी 0।।३।।
अब तो समझ तूहि है खास ईश्वर ।
न तू देह है ना मन-बुध्दि जडचर ।।
कहे दास तुकड्या, तेरि तो जहाँ है ।।भले आदमी 0।।४।।