ये विश्वही मन्दीर है

            (तर्ज : आकळावा प्रेम -भावे. . )
यह विश्वही मन्दीर है, मानव  यहाँकी देवता ।
पशु-पक्षी-कीटक-वृक्ष ये,इनमें हैं सेवा-योग्यता ।।टेक।।
उपभोग इनका योग्य लो, पूजा समझकर -मानके।
हिंसा न हो किस जीवकी,यही देवता की पात्रता ।।1।।
हर तत्व है तैयार हरदम, जो जिसे प्रभुने दिया।
उसको सहारा हो तुम्हारा, प्रेम हो और मान्यता ।।2।।
नहीं वस्तु दुनियाँमें कोयी,जिसको उठा तुम फेंक दो।
तुकड्या कहे अपने समझकर, पूर्णसे हो  पूर्णता ।।3।।