मै तेरे दरपे आके पुकारुँ तुझे
(तर्ज : सारी दुनियाँ का तू ही...)
मैं तेरे दरपे आके पुकारूँ तुझे।
तू ही कहता था, आवो, सुधारूँ तुझे ।।टेक।।
मुझको गीताने भेजा कि मंदर में जा ।
कुछ भी बाहर न रखना,तू अंदर में जा।।
करके आया हूँ, दिल धो, बिचारूँ तुझे ।।1।।
श्यामसुन्दर जरा बाँसुरी दे बजा ।
मुझसे कर प्यार, में भी धरूँ अलगुजा ।।
तुझमें जाऊँ समा, फिर निहारूँ तुझे ।।2।।
मेरे नयनोंमें अंजन तू ही डाल दे ।
तुझको नहीं छोड़ूं ऐसी गले माल दे।।
बस, यही वख्त है, जो निहारूँ तुझे ।।3।।
शाद बदलूँ तो तेरी निगा हो बनी ।
जीव तो हैं ये माया से नाती जुनी ।।
कहता तुकड्या, कलेजे से धारूँ तुझे ।।4।।