प्यार की बाँसुरी सबके ही पास है
(तर्ज : सारी दुनियाँका तू ही...)
प्यार की बाँसुरी सबके ही पास है ।
क्यों बजाते नहीं ?- लेते बनवास हैं ।।टेक।।
कामक्रोधोंके पोंगे तो सुनते सदा ।
रोजका एक झगडा भी होता अदा ।।
अपनी आत्मा के अब तो बनो दास हैं ।।1।।
विषयकी और धन की करो चाकरी।
उसके मारे फिरो, वासना ना मुरी।।
इनसे क्या पायगा, आखरी नाश हैं ।।2।।
जबके सत्संगकी प्रीत आते रहें ।
तबतों फिर प्रेम बन्सीकी बातें रहे।।
सत्गुरु की करो बन्दगी, बाँस है ।।3।।
श्यामने-रामने इसको चाटा तुम्हें।
कर दिखाया करिस्मा और बाँटा तुम्हें ।।
कहता तुकड्या तुम्हारे तुम्हीं खास है।।4।।