मेरी नब्ज तुम्हारे हाथमें
(तर्ज : बन्सीका बजाना छोड दे... )
मेरी नब्ज तुम्हारे हाथमें, मेरे चंचल मनको जमा दो ।
प्रभु ! इतना कहना मानलो, तुम चाहे जिधर घुमा दो ।।टेक।।
सारे बैद्य ढँढोले मेंने, उसकी ही औषध को पाने |
जिधर-उधर चक्कर ही पाया, मिला न कुछ भी साथमें ।।1।।
मिचक-मिचककर नैन लगाता ,जमा -जमा आसनको करता।
एक पल कभी नहीं रूकता है,भटके बातकी बातमें।।2।।
तलघरमें, मन्दरमें जाऊँ, दम रोकूं कुंभक कर पाऊँ।
रेचकपर जब उतरा निचे, मिलता पिछली जातमें ।।3।।
बाहर तो दिखता हूँ योगी, पर मनका हूँ अंतर-भोगी।
तुकड्यादास कहे कुछ ना दो, इतना दो खैरात में ।।4।।