परवाह न करते मोक्षकी

           (तर्ज : बस्सिका बजाना छोड दो... )
परवाह न करते मोक्षकी, हम चाहते सन्त गुलामी ।
उनकी सेवाके सामने, है कौन बडे खल - कामी ?।।टेक।।
रूखे -सुखे हों तुकडे भी, तनसे हों चाहे जखडे भी |
मीठे हैं हमको अमृतसे, नहीं जरूरत साक्षकी ।।1।।
उनकी दरपर झाड़ू लगावे, उनकी आज्ञापर मर जावे |
यही है बाणा हम सेवकका,यही बात है लक्ष्यकी ।।2।।
सुख -सागर उनके चरणोंमें, तीरथ है उनकी बाणीमें ।
अनुभव-स्रोंत पझरता निशि-दिन,कमी नहीं है भक्षकी ।।3।।
एक मिगा किसपर हो जाये, उसका बेडा पार कराये ।
पोथी-तोती यहि तो कहती, इसी शक्तिके पश्षकी ।।4।।
जन्म-जन्म उनकी सेवा हो, और नहीं दुसरी है चाहा ।
तुकड्यादास कहे जी कहता,अमर कीर्ति इस वृक्षकी ।।5।।