मीठी बात कहाँसे आवे

(तर्ज : हरि भजन करे तो तू तर जायेगा रे...)
मीठी बात कहाँसे आवे, मन नहीं भायेगा रे ।
जिसका स्वारथ बिगडा जावे,क्या सुहायगा रे?।।टेक।
जबके सबको अपना माने,अनुभव भी लग जाय कहाने ।
क्लेश-द्वेष सबही मिट जावे, तब सुख पायेगा रे ।।1।।
षड्विकार बैठे जब तनमें, वो कैसे रहे प्रेम सदनमें? ।
बिना काम उसको न  ख़ुशी,   सुन   पायेगा   रे  ।।2।।
इस कारण कहता हूँ सुनिये,राम भजनसे चित्तको मनिये ।
राम ही राम दिखे जब सब तन, प्रेम उठायेगा रे ।।3।।
फिर तो मीठी मुँहमे बाणी,कान सुने सुखकी ही कहानी ।
तुकड्यादास कहे, तन-मन सबही, रंग जायेगा रे ।।4।।