मेरी कसम और तेरी कसम

            (तर्ज : उठा गड्या अरुणोद्य झाला.... )
मेरी कसम और तेरी कसम, ये दोनों कस्मा कसम करो ।
तुम-हम दोनों मिलके रहो और भारत माता भस्म करो ।।टेक।।
यही चली है राजनीति और धर्मनीति के हाल यहाँ ।
क्या वह दिन हम याद करें, जब कोई न था बेताल यहाँ ।।१।।
सब मिलके रहते थे, अपनी ग्राम-जिन्दगी बसर करें ।
फटे-फुटे भी थे पर दिल तो, थे सब प्रेमका असर करें ।।२।।
मगर न इतनी ऐश-अरामी और हरामी जरा पतली ।
आज तो बन्दे ! गजब हुआ,ये आयी हवा और कहाँ चली ।।३।।
सबको चाहिए लिडर - कुर्सी, खेती रोती पड़े-पड़े ।
अपने मतलब पूरे न हो तब, घर-घरमें चलते झगडे ।।४।।
बेटा लडता बापसे, और   साला   लडे  जवाई   से ।
लडकी लडती शादी करने, मैं ब्याही जाती दिलसे ।।५।।
था जो पैसा छुपा दिया सब, टैक्स भराकर खत्म किया ।
आमदनी का पता नहीं अब, समानताका राज भया ।।६।।
कैसा देश   चलेगा   मित्रों !  नवनिर्माण   न   होवेगा ।
तुकड्यादास कहे कोई बिरला, आकर देश उठायेगा ।।७।।