मैं हूँ हरिका पहिरेवाला
(तर्ज : हरि भजन करो तो सुख पायेगा रे ! ...)
मैं हूँ हरिका पहिरेवाला, अन्दर तुम मत आवो जी ।
ये तन-धाम उसीका वाला, अन्दर दिया सजाकर जी ।।टेक।।
कान-नाक-अखियाँ है खिडकी, मुंह है बोलन की एक मडकी ।
मन करता है हरदम झडपी, उसको मैं समझाऊँ जी ! ।।1।।
काम-क्रोध का हमला होता, उधम मचाता गोता खाता।
हँसता हूँ मैं देखके उनको, तब तो राह बताऊँ जी ! ।।2।।
ग्यान-ध्यान जब संगत होती तबतो सबको शांती सुहाती।
तुकड्या आतम मालीक वाला, ज्योतमें ज्योत जगाऊँ जी ! ।।3।।