प्रभु-भक्तिसे क्या नहीं पावे ?

         (तर्ज : तुझ़या स्वरूपी सदा आनंद...)
प्रभु-भक्तिसे क्या नहीं पावे ? -सब बेद-पुराण सुनावे !
जो मन तन्मय कर गावे,सब तनकी लाज भगावे ।।टेक।।
नयनों में प्रेम भरी आवे, आनन्द कहा नहीं  जावे ।
हर श्वास-श्वासमें पावे, तन- मनसे सुख उपजावे ।।1।।
संसार से दिल नटता है, विषयोंसे ख्याल हटता है ।
भेदो का जाल  फटता   है, नैनोसे    नीर     बहावे ।।2।।
सब अंग-अंग पुलकित  है, रोमांच उठे पर-हित है ।
शत्रु भी लगे प्रिय मित है,सब रोम-रोम हरि   गावे ।।3।।
अति सुखसे इद्रिय-शान्ति, मिट जात जीवकी भ्रांति ।
बनति है प्रभु-सम कांति,दोनों भी भिन्न नहीं भावे।।4।। 
हर बातमें भोजन तृप्ति, नित चढे आत्म की वृत्ति ।
तुकड्या कहे,पाती मुक्ति, मैं - तू का भेद मिट जावे।।5।।