मैं गोविन्द के गुण गाऊँ
(तर्ज : तुझया स्वरूपी सदा आनन्द... )
मैं गोविन्द के गुण गाऊँ, नाचूं करताल बजाऊँ ।
मीरा की याद सुनाऊँ, भगतों की बात बताऊँ ।।टेक।।
बाणी तो सुनी बेदोंकी, पर राह चलूँ संतोंकी ।
फिर ज्योति मिलाऊँ मनकी,तन-मन-भक्तिसे रँगाऊँ ।।1।।
जहाँ भक्ति, वहीं है मीरा, बिन भगती कोउ न पूरा ।
जो जाने परा और अपरा, दोनों का मेल मिलाऊँ ।।2।।
मेरे सद्गुरु ग्यान बताया, सेवा की राह दिखाया ।
हुआ चित्त शुद्ध तब पाया, यहाँ खूलेआम बताऊँ ।।3।।
तुम चलो हमारे सँगमें, क्यों पड़ते झूठे रँगमें ?
तुकड्या कहे, बोलुँ अभंगमें, सब मिलकर प्रेम बहाऊँ ।।4।।