प्रभुने, सबकी टेक निभादी

(तर्ज : बन्दे ! पलभर राम सुमरना...)
प्रभुने, सबकी टेक निभा दी ।
भोले-भाले  भगत - जनोंकी ,
आशा   पूरी      कर        दी ।।टेक।।
श्रद्धासे जो सुमरन  करता  ।
काया -वाचासे      आचरता ।।
मुक्ति     उन्हींके    घर    दी ।।1।।
अहंकार जिसको व्यापा है |
स्वार्थ भरा, नहीं अनुकंपा है ।।
उनकी    फजिती    कर   दी ।।2।।
छल कपटी का नाश कराया ।
भगतों के घर छिलके खाया ।। 
किसकी      हुंडी    भर    दी ।।3।।  
तुकड्यादास कहे प्रभु भजता। 
तन - मनसे  सेवामे   लगता   ।।
पूरन     आशा     कर     दी  ।।4।।