मुझमें भी बडी आदत है बुरी

      ( तर्ज : दिलमें ही नहीं जब शांति मिली... ) 
मुझमें भी बडी आदत है बुरी,में सबकी वाहवां करता हूं।
हो चोर कहाँका व्यभिचारी,उससे नहीं हाथ उजरता हूँ ।।टेक।।
अपने को क्या करना है समझ,उसको तो सजा प्रभु ही देगा।
ईश्वर तो बनिया है इसका, यह बात मगज में भरता हूँ ।।1।।
व्यवहार नहीं है यह अच्छा,ऐसा तो समझता हूँ दिलमें।
पर मैं हूँ कौन नियामक तो यह बीच-बीचमें करता हूँ ।।2।।
हर चीज को प्यारसे देख सके, ऐसी ही हमारी आदत है।
हँसते होंगे कई लोग मेरे, पर मैं नहीं मन में डरता हूँ।।3 ।।
लाचारि मेरी प्रभु टूर करे, मुझको दुनिया नहीं दिखने दे |
जो कुछ भी दिखे,भगवान दिखे,तुकड्या कहे फिर मैं सुधरता हूँ ।।4।।