मेरा संग्रह राजपाट नहीं
(तर्ज : हे दीनदयाधन, करुणा-सागर....)
मेरा संग्रह राजपाट नहीं, नहिं कोइ पंथ-अखाडा |
नहीं मोह बना लूंबाडा।।टेक।।
पर लगता है, भारत अपना इतिकर्तव्य संभाले ।
अपने बलपर खडा रहे और बविश्वकों मार्ग बतादे।।1।।
आपस की दूही को छोडे, लगे विधायक करने ।
घर-घर में हो दूध की धारा, बालक, वीर सुधरने ।।2।।
सन्त-महन्तोंने धन बाँटा, नीति प्रेम प्रभू का ।
इसको भूले नहीं भारती, सब हो भला उन्होंका ।।3।।
वीर लडें मैदान में कुश्ती, बूढ़े ग्यान सिखावे।
भक्त करे गुणगान प्रभूके, सब झगडे मिट जावे ।।4।।
किसान खेती करे प्रेमसे, अधिक अन्न उपजावे ।
चोर, शराबी, व्यभिचारी तो जरा न रहने पावे ।।5।।
सब की खुशी में मुझे खुशी है, ऐसा मार्ग है मेरा ।
तुकड्यादास कहे सब मेरे, गुरु रहे या चेरा ।।6।।