परमपिता परमेश्वर सबके अंतर्यामी

       (तर्ज: हरिका नाम सुमर नर प्यारे... )
परमपिता परमेश्वर सबके अंतर्यामी रहता है ।
क्यों डरता है उसे छोड़कर ? क्यों नहि उसकी सुनता है ? ।।टेक।।
बारबार देता है जता, पर तू तो मनके   साथ   भगे ।
एकबार नहि लाखों ठोकरे खाकरभी नहि रहे जगे ।।
एकबार तो कहता है कि, मुझको धोका  हुआ  खरा ।
फिरसे पकडमें जाता मनके ,क्या कहना तेरा नखरा !
पूर्वजन्मके पाप है तेरे करके  कहा   नहिं   मनता   है ।
                      क्यों डरता है0।।१।।
जिसने जिसने मानी उसकी, वह तो सुखसंपन्न भये ।
तीनों लोकमें चमक गये और पूजा के भी  योग्य  हुए ।।
कामक्रोध के लंदफंद में कभी    नहीं   वह   खडे  रहे ।
लोभ दंभको छोडके अपनी सुखशान्ति में  बैठ   गये ।।
अपरंपार प्रेमधारा के, क्यों न   भजनमें   रंगता    है ?
                     क्यो डरता है 0।।२।।
चोरी जारी-पापकर्म के समयभी उसका पहरा   है ।
समझाता है नेक रहो पर इंद्रिय का मद गहरा है ।।
मन तो चंचल रहे जो दोनोंको भी लालच देता है ।
समय पड़े पर भाग निकलता,वह तो पूरा अछूता है ।।
संतसाधु है ज्ञानमार्ग के, उनका  डंका   बजता   है ।
                    क्यों डरता है0।।३।।
प्रभुने खेल रचा है ऐसा, देखें किसको साच  जँचे ?
इस माया-ममता के श्रमसे इस संसारमें कौन बचे?
सूर्य रहे फिरभी अंधियारा किस-किसको तो लगता है।
यह अज्ञान भरा है किसने? वही जीवोंको ठकता   है ।।
तुकड्यादास कहे   ठोकर के मारे कभी  सुधरता   है ।
                    क्यों डरता है0।।४।।