नग्न दिगंबर खुला
(तर्ज - मोल न कुछ भी लिया...)
नग्न दिगंबर खुला, वह सन्त गजानन ! मिला ।
अपनी धुनमें चला और चाहता है कुछ तो खिला ।।टेक।।
मैंने रोटी मांगके खाया, भक्तिभावसे उन्हे खिलाया ।
वह कहते है, कुछ नहिं पाया, अहंकार सब दिला ! ।।१।।
अहंकार जब अर्पण कीना,तब कहे आशाको दे छीना ।
अपने पासमें कुछ नहीं रखना, तब जावेगी बला ! ।। २।।
जो कुछभी मुझमें अवगुण थे,देकर बचे वो संतचरण थे
अब आगे सेवाके मन थे, आशिष देकर चला ! ।।३।।
नींद खुली जब आँख उठाया, भरा सिराना फूल झुकाया ।
तुकड्यादास कहे क्यों आया, समझा मैंने भला ! ।।5।।