नगर-नगर में डगर-डगर में

           (तर्ज : बन्दे मातरमू बन्दे मातरम्‌. . . )
नगर-नगर में, डगर-डगर में, गूंजें यह आवाज मेरा |
सदाचार बिन शान्ति न आवे, भारतियो तुम ! सुनो जरा ।।टेक।।
श्री नन्दा ने सोच-समझकर, बात उठाई जोरोसें ।
नेक रहे तो हम साथी है, फिर निपटेंगे औरोंसे ।।1।।
धर्मवान-साधु और नेता, दिलसे मिलके काम करो ।
इस भारतको हुई बिमारी,आवो इनको लो सुधरो ।।2।।
घुसखोरी,चोरी और लुचपत, इनका अन्त ही होना है।
नहीं तो देशको आग छगेगी, किससे नहीं कुछ बनना है ।।3।।
भारत-साधु, भारत-सेवक, और भी संस्था काम करे |
गाँव - गाँवमें सभा भरायें, लुचपतखोरी दूर करे ।।4।।
धर्मवान्‌ देशो में सबसे मोटा यही तो   कलंक है -
झूठ बोलकर, कसम खवाकर, मारे काली डंक है ।।5।।
मुभा है सबको ऐसा, जो-जो करते, उनसे बात करो |
डरो नहीं फिर जो हो जाये, अन्यायी के द्वार मरो ॥6।।
सरकारी अफसर नहीं माने,पर जनता की साक्ष भरो ।
सदाचार अब बनके रहेगा, सावधानी से काम  करो ।।7।।
पहले तो तुम हाथ जोडकर,करो विनंती जा उनसे ।
तुकड्यादास कहे यह बोलो,पाप करो नहीं तन-मनसें ।।8।।