देशभक्ति उन्हींकी है

                (तर्ज : बजाई बन्सरी मोहन... )
देशभक्ति उन्हींकी है, जो त्यागे मोह निज घरका ।
बनाये देश अपना घर, छोड़कर पाश जर-डरका ।।टेक।।
तमासा हैं नहीं कोई, बनेगा देशका प्यारा ।
न्याय को तौलता जो है, मुकुट होता है वो सरका ।।1।।
बढ़ी है शौकिनी जगमें, जो चाहे लूट लेजाये ।
ये जंजिर है मरे दमका, बयाना होता  परवर   का ।।2।।
अगर सध जाय तो बन्दा, नहीं तो फिर रहा गन्दा ।
गलतियाँ हों कहीं ज्यादा, सरे बदनाम जी भरका ।।3।।
समा कबतक समायेगा, ईमानी हो  कहीं गायब?
अगर जँच जाये किसके दिल, बजेगा बाज आखरका।।4।।
हो जिसका संयमी जीवन, वही सेवा करे सबकी ।
वो तुकड्यादास कहता है, वही है पात्र आदरका ।।5।।